Thursday, June 10, 2010

SHALINIAGAM


उसने कहा था .........
तुम्हारी आँखें उन आँखों का ज़िक्र करतीं हैं,
फकीर हो गए जिनकी तलब में शहजादे !
आज फिर कुछ इसी तरह फिर से कोई,
बोला मुझसे..........
क्या बात कहूं उन आँखों की,
जिन आँखों प़र मै मरता हूँ,
वो आँखें झील सी आँखें है,
जिनमे डूब के रोज उभरता हूँ,
कोई आंसूं न आये इन नैनों से,
बस इतनी दुआ मै करता हूँ.
.......................................
पल पंख लगा कर उड़ गए ,
एक जन्म में दो-दो बार मिला,
प्यार से भी ज्यादा प्यार,
फिर भी कितना ख़ाली-ख़ाली सा,
लगता है ये मोरा जिया.
डॉ.शालिनिअगम
१० जून २०१०
www.aarogyamreiki.com







Tuesday, June 8, 2010

शालिनीअगम (शुभ आरोग्यं) ध्यान की सरलतम विधियाँ

नमस्ते भारतवर्ष


अपनी श्वांसों के आवागमन को केवल साक्षी भव से देंखें ............साँसे आ रहीं हें ...............साँसे जा

रहीं हें। इस क्रिया को आनंद के साथ सिर्फ अनुभव करें। धीरे-धीरे साँसों की गति कोधीमा करतें जाएँ।

मन इधर-उधार भटकता है ,भटकने दो,.............. इधर -उधार भागता है , भागने दो...........

जब साँसों की गति धीमी होने लगेगी ,तो मन का भटकना भी कम होता जाएगा ।

१ से १० तक की गिनती तक सांसों को भरें और फिर छोड़ें

अब आत्म-स्थिर होने का प्रयत्न करें। अकर्ता भाव से शरीर से अलग होकर ,शरीर में होने वाली हर क्रिया को बस अवलोकन करतें रहें.जैसे आप चित्र-पट प़र कोई चल-चित्र देख रहें हों.अब आप अलग है और शरीर अलग। शरीर में अनेको घटनाएँ घट रहीं हें,मन उछल -कूद कर रहा है। कहीं दर्द हो रहा है तो कहीं खुजली हो रही है,कहीं आराम आ रहा है कहीं बेचैनी है ,कहीं हल्का है तो कहीं भारी है ।

आप बस केवल उसे चुप-चाप महसूस करतें रहें, निहारतें रहें ................न कोई क्रिया - न प्रतिक्रिया ।

२४ घंटे बस साक्षी-भाव से अपने आपको साधतें रहें तो मन से भय,क्रोध,घृणा,चिंता,निराशा सभी कुछ निकलता चला जायेगा और फिर धीरे-धीरे आप पाएंगे कि आप ध्यान-पूर्ण होते जा रहें हैं ......



शालिनिअगम

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नमस्ते भारतवर्ष
अपनी श्वांसों के आवागमन को केवल साक्षी भव से देंखें ............साँसे आ रहीं हें ...............साँसे जा
रहीं हें। इस क्रिया को आनंद के साथ सिर्फ अनुभव करें। धीरे-धीरे साँसों की गति कोधीमा करतें जाएँ।
मन इधर-उधार भटकता है ,भटकने दो,.............. इधर -उधार भागता है , भागने दो...........
जब साँसों की गति धीमी होने लगेगी ,तो मन का भटकना भी कम होता जाएगा ।
१ से १० तक की गिनती तक सांसों को भरें और फिर छोड़ें
अब आत्म-स्थिर होने का प्रयत्न करें। अकर्ता भाव से शरीर से अलग होकर ,शरीर में होने वाली हर क्रिया को बस अवलोकन करतें रहें.जैसे आप चित्र-पट प़र कोई चल-चित्र देख रहें हों.अब आप अलग है और शरीर अलग। शरीर में अनेको घटनाएँ घट रहीं हें,मन उछल -कूद कर रहा है। कहीं दर्द हो रहा है तो कहीं खुजली हो रही है,कहीं आराम आ रहा है कहीं बेचैनी है ,कहीं हल्का है तो कहीं भारी है ।
आप बस केवल उसे चुप-चाप महसूस करतें रहें, निहारतें रहें ................न कोई क्रिया - न प्रतिक्रिया ।
२४ घंटे बस साक्षी-भाव से अपने आपको साधतें रहें तो मन से भय,क्रोध,घृणा,चिंता,निराशा सभी कुछ निकलता चला जायेगा और फिर धीरे-धीरे आप पाएंगे कि आप ध्यान-पूर्ण होते जा रहें है ।
Dr shaliniagam


शालिनीअगम (शुभ आरोग्यं) ध्यान की सरलतम विधियाँ-2




Friday, June 4, 2010

शालिनिअगम कहाँ हो प्रिय ???????

कहाँ हो प्रिय ???????

अनेकों बार
मन को समझातीं हूँ ,
किंचित! अब प्रभात है,
मेरे जीवन का ,
कितने मन-मयूर ,कोकिला
मेरे अंगना
नाचने को आशान्वित हैं!
रचूँगी दिवास्वप्न ,
गढ़ूंगी आकृतियाँ
बावरा मन नित
नए स्वप्न बुनता है
मेरे मीत
निहारते मेरा रूप,
चंदा-चांदनी का खेल
हौले से मूंदें नेत्र
आराध्य मेरे खोये रहें ,
प्रिय वक्ष प़र धर शीश ;
स्वप्न मेरे
मिलन अधरों का,
लहर उठे तन-मन में ,
मेरे सुर-सगीत निछावर
प्रिय के अनुराग में,
प्राण मन के मीत मेरे
स्वप्न के आधार.....
कंहा हो???????
ढूढंती हर क्षण प्रिय ......
डॉ। शालिनीअगम
३१/०७/89
www.aarogyamreiki.com

SHALINIAGAM Tip of the day (ध्यान की सरलतम विधियाँ )

नमस्ते भारतवर्ष
आज मैं आपको ध्यान यानि meditation की बहुत आसन विधि बताने जा रहीं हूँ ।
ध्यान की सरलतम विधियाँ
१- आराम की मुद्रा में बैठ जाएँ. सर्वप्रथम श्वांसों को गहराई से छोड़ने का प्रयास करें । केवल सांसों को गहरा-गहरा लें और छोड़ें। इस प्रक्रिया में शरीर की दूषित वायु निष्कासित होती है और तन-मन प्रफुल्लित रहतें हैं । साथ ही अनेक गन्दी आदतों से छुटकारा भी मिलता है।
२-आंखे बंद करके शांत मन से आरामदायक आसन में बैठ जाएँ और अपने तन व् मन को ढीला छोड़तें जाएँ और कल्पना करें कि हमारा अंग-प्रत्यंग पूरी तरह शांत हो रहा है। नख से शिख तक सभी अंग शिथिल व् मूर्तिवत हो गएँ हैं। इस तरह १० मिनिट से लेकर आधा-एक घंटे तक प्रयास करें । वातावरण को संगीत -मय बनाने के लिए ॐ ध्वनि लगा सकतें हैं।
३-मौन-भाव से शांत व् स्थिर होकर बैठें । आरम्भ में केवल ॐ का उच्चारण करतें जाएं और बारी-बारी से अपने शरीर को बंद आँखों से पैर के अंगूठे से लेकर सिर तक अवलोकन करतें जाएँ ।महसूस करें कि जिस जिस अंग को आप मन की आँखों से देखते जा रहें हैं वह अंग स्वस्थ व् सुंदर होता जा रहा है।
४- वातावरण में ॐ व् परम-शक्ति की उपस्थिति का भान होने से आपका ध्यान स्वासों के आवागमन के साथ जो सकारात्मक ऊर्जा से परिचय करेगा तब आपका तन-मन स्वस्थ व् प्रसन्न होने का अहसास करेगा।

डॉ.शालिनीअगम
www.aarogyamreiki.com

SHALINIAGAM Tip of the day (ध्यान की सरलतम विधियाँ )

नमस्ते भारतवर्ष
आज मैं आपको ध्यान यानि meditation की बहुत आसन विधि बताने जा रहीं हूँ ।
ध्यान की सरलतम विधियाँ
१- आराम की मुद्रा में बैठ जाएँ. सर्वप्रथम श्वांसों को गहराई से छोड़ने का प्रयास करें । केवल सांसों को गहरा-गहरा लें और छोड़ें। इस प्रक्रिया में शरीर की दूषित वायु निष्कासित होती है और तन-मन प्रफुल्लित रहतें हैं । साथ ही अनेक गन्दी आदतों से छुटकारा भी मिलता है।
२-आंखे बंद करके शांत मन से आरामदायक आसन में बैठ जाएँ और अपने तन व् मन को ढीला छोड़तें जाएँ और कल्पना करें कि हमारा अंग-प्रत्यंग पूरी तरह शांत हो रहा है। नख से शिख तक सभी अंग शिथिल व् मूर्तिवत हो गएँ हैं। इस तरह १० मिनिट से लेकर आधा-एक घंटे तक प्रयास करें । वातावरण को संगीत -मय बनाने के लिए ॐ ध्वनि लगा सकतें हैं।
३-मौन-भाव से शांत व् स्थिर होकर बैठें । आरम्भ में केवल ॐ का उच्चारण करतें जाएं और बारी-बारी से अपने शरीर को बंद आँखों से पैर के अंगूठे से लेकर सिर तक अवलोकन करतें जाएँ ।महसूस करें कि जिस जिस अंग को आप मन की आँखों से देखते जा रहें हैं वह अंग स्वस्थ व् सुंदर होता जा रहा है।
४- वातावरण में ॐ व् परम-शक्ति की उपस्थिति का भान होने से आपका ध्यान स्वासों के आवागमन के साथ जो सकारात्मक ऊर्जा से परिचय करेगा तब आपका तन-मन स्वस्थ व् प्रसन्न होने का अहसास करेगा।

डॉ.शालिनीअगम
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Wednesday, June 2, 2010

शालिनीअगम ( कुछ शब्द मेरे अपने)

namaste India

सौंदर्य का सार
सौंदर्य ........................................
भला लगता है नेत्रों को,
सुखद लगता है स्पर्श से,
सम्पूर्ण विश्व एक अथाह सागर ,
जिसमें भरा है सौंदर्य अप्पर,
हर चर-अचर हर प्राणी ,
सौंदर्य को पूजता है बारम्बार !
सौंदर्य का कोष है पृथ्वी-लोक ,
सौंदर्य का भण्डार है देव- लोक,
प्रत्येक पूजित-अपूजित व्यक्ति,
कल्पना करता है तो केवल ,
सौंदर्य को पाने की ,
परन्तु......................
ऐसे कितने मिलते हैं यंहा ,
जो रूपता-कुरूपता को,
समान पलड़े प़र तोलते हैं ,
जो चाहतें हैं मानव-मात्र को
मानते हैं दोनों को समान

शालिनिअगम ( कुछ शब्द मेरे अपने )


मेरा नृत्य कोई और नहीं कर सकता,
मेरा गीत कोई और नहीं गा सकता,
मेरे उत्सव कोई और नहीं मना सकता,
मैं अपनी रचियता स्वम हूँ,
शालिनीअगम
२०१०
comment:
hi sweety,
you deserve to love and respect yourself and to honour your creative yearnings...........
yours

सौन्दर्यमयी सुश्री शालिनी ,
अहो भाग्य ! जो आपकी सुंदर रचना पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ .
भविष्य में भी इसी प्रकार क्रियाशील रहिएगा.
आपका प्रशंसक

SHALINIAGAM (कुछ शब्द मेरे अपने)


कुछ शब्द मेरे अपने (स्व:)
कौशार्य की विस्मृत कोमलता लौट आने को है,
बचपन के उमंग , उल्लास ,स्वच्छंदता ,गीत-नाद ,
उत्सव------ सब कुछ लुप्त हुए थे कभी ,
प़र साजन के प्रेम में भीगी ,
चपल खंजन-सी ,फुदकती,चहकती ,
नवयुवती अलसाने को है!
डॉ.शालिनीअगम
2002

SHALINIAGAM (TIP OF THE DAY)SHUBH AAROGYAM


ये ज़िन्दगी बेहद खूबसूरत है,
अगर हम चाहें तो और भी ख़ूबसूरत हो सकती है ,
क्योंकि हमारी ख्वाहिश ये सृष्टि मानती है और उसे उसे पूरा करती है.
ये अलौकिक शक्तियां मेरे लियें अलादीन का चिराग़ हैं जो मांगती हूँ मिलता है.......
.......पैसा, प्यार, शौहरत , स्वास्थ्य .
हर पल जो चाहतो हो मांगो सृष्टि से ,
विश्वास करो कि जो माँगा है ,बस पा ही लिया है,
महसूस करो कि जो माँगा, उसे पाने के बाद कितनी ख़ुशी मिल रही है,
में जो चाहती हूँ ,उस पर विचार करती हूँ, कागज पर लिखती हूँ,
फिर अटूट विश्वास करती हूँ,आशावादी सोच रखती हूँ ,
फिर मैं उसे पा लेती हूँ .
हम सबको अपने और सृष्टि के बीच ताल-मेल बिठाना आना चाहिए
जब भी हालत बदलने हों ,पहले विचार बदलो .
क्योंकि मैं प्रकृति का , सृष्टि का, धन्यवाद करती हूँ , ज्यादा पाना चाहती हूँ तो शुक्रिया करती हूँ
इच्छा -शक्ति से क्या नहीं हो सकता ,आप अपनी इच्छा-शक्ति और यकीन से आप क्या नहीं पा सकते.
अपनी उम्मीद से बड़ी कोई तस्वीर , कोई इच्छा देखो,सोचो, आँखे बंद करके महसूस करें कि वह मजिल मैंने पा ली है .
डॉ.शालिनीअगम
2010