प्रथम मिलन कि उस बेला प़र
अश्रु-विगलित नेत्रों से जब,
देखा उन्होंने पहली बार,
मन मैं कुछ हुआ था तब,
आशाएं थीं जागी हजार,
समर्पण कि इच्छा उठी,
न्योछावर की चाह नयी ,
जीवन-साथी बना लें मुझको,
वारू तन-मन क्षण-क्षण,
वारू तन-मन क्षण-क्षण,
मन के तारों की लय से,
उर तरंगित होने लगे,
मूक दृष्टि से में और वो,
प्रेम-गीत भी गाने लगे।
त्याग-जल के सिंचन से ,
प्रेम-बेल विकसित होगी,
एक-दूसरे के बनकर ही,
जीवन-समर में जय होगी।
जीवन-समर में जय होगी।
डॉ। शालिनीअगम
1989