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Saturday, April 17, 2010

भरोसा

हाथों का स्पर्श हटा लेने से ,
मन का विश्वास कम नहीं हो जाता,
अपनों से दृष्टि घुमा लेने से,
रिश्तों का भान कम नहीं हो जाता,
रवि के बादलों में छिप जाने से ,
दिन का उजाला , कम नहीं हो जाता,
पूर्णमासी का चाँद निकलने प़र भी,
रात्रि का अन्धकार समाप्त नहीं हो जाता,
बांध को बांधने प़र भी ,
मचलती धारा का वेग कम नहीं हो जाता;
अपनों के लाख तिरस्कार के बाद भी ,
उनकी घोर घृणा के बाद भी,
उन प़र भरोसा कम नहीं हो जाता!
शालिनिअगम
१९९