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Monday, April 12, 2010

freedom

उड़ जाऊँ नील गगन में
पंख फैला कर अपने,
बतीयाऊँ बादलों से ,
खेलूँ खुले गगन में,
छेड़ू पंछियौ को,
फिर. चुपके से..
उतरू सजना के अंगना,
बनूँ मन मोहनी,
बोलूं मीठी बोली,
जब हाथ बढें प्रीतम का,
फिर फुर्र से उड़ जाऊँ मैं.
shaliniagam