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Friday, April 9, 2010

kavita

कविता की मिट्टी की सुगंध को,
सूंघा तो अनेको बार है मैने:
पर उसमे बीज बन कर डलना
और पल्लवित होना बहुत कठिन है:
कविता के सागर की लहरों का घुमडना,
उमडना देखा तो है अक्सर:
पर उसमें डूब कर उतरने
का साहस बहुत कठिन है:
कैसी होती है कविता?
क्यों होती है कविता?
कब बन जाती है कविता?
कवि के ह्रदये की गहनतम गुफा
में प्रकाश बन पहुँचना
बहुत कठिन है.
रास्ते पर नंगे पाँवों जाती
उस विरहन को देखा तो बहुत है
पर उसके मन की असीम पीड़ा,
को समझ पाना बहुत कठिन है:
कविता के नभ के विस्तार,
को पलकें उठाकर देखा तो है हमने,
पर उस तक पहुँचती सीढ़ीयों पर,
चढ़ पाना कितना कठिन है:
कविता के झरझराते निर्झर
झरने का जल पिया तो बहुत है,
पर उसमे तिनका बन बह कर,
सरिता में मिल जाना कितना कठिन है
dr. Shaliniagam