Friday, November 14, 2014

Dr.Shalini Agam .. short story

"प्राण मेरे "
साँझ का समय था अल्हड ,मदमस्त हवाएँ चारों ओर फ़िज़ा के रंग में घोल  रही थीं। वातावरण में सघन चुप्पी सी थी ,दूर कहीं पानी का झरना  अपनी सुरीली सी तान छेड़ रहा था ,सुरम्य वादी महकते  फूलों से भरी थी ,पास ही झील  में खूबसूरत फूल खिले हुए थे मानों किसी मनमोहिनी के कर-कमलों का स्पर्श पाने को आतुर हों , सरसराती पवन और उसमे लहराते  "कुमार" के बाल। . बार-बार एक लट चन्द्र -कला सी उस रजत-चन्द्र के मुखड़े पर आकर ठहर जाती थी। . गुलाबी कोमल अधरों पे कोई गीत था। जिसे "कुमार" बड़ी तन्मयता से गुनगुना रहे थे। . मोंगरे की भीनी -भीनी महक वातावरण को सुवासित कर रही थी ,अपने ही गीत में गुम  होते -होते "कुमार" अतीत की उस काली अमावस्या में खो गए। . उदासी भरे भाव उनके मुख-मंडल पर अनायास ही गहराने लगे मानो कोई चि"प्रतियोगिता के लिए 'र -परिचित पीड़ा उन्हें किसी भी प्रकार चैन नहीं लेने देती।  ये हर शाम का उपक्रम था जब कुमार दिन  ढले यहाँ  आकर वर्षों पड़ी एक शिला पर बैठ जाया करते थे और इसी प्रकार विरह की तान छेड़ा करते थे ,दृष्टि उनकी सदैव सामने एक खंडहर पर ही रहती जैसी किसी का इंतज़ार है एक मुद्दत से , ....  और यहाँ आकर  जैसे ही वो व्याकुल प्रेमी श्रृंगार गीत का राग छेड़ेगा उसकी नायिका तड़पती हुई बड़ी शिद्दत से लिपट जाएगी कुमार के सीने  से  । ये मात्र कल्पना नहीं ऐसा ही होता था जब भी कुमार यहाँ आकर अपनी सुरीली तान छेड़ते ''नंदिनी  का मन बेकाबू होने लगता सारी  सीमायें तोड़ वो दौड़ती हुई कुमार के चौड़े कन्धों पर  अपना सर टिका देती  ।आह!कितना सुहाना पल होता था वो जब नायक के गीतों पर नायिका के महावर रचे नरम पैर घुँघरू की ध्वनि से गुंजायमान हो थिरकने लगते थे ,नृत्य -मग्न नायिका और गीत गाते  नायक की लय -ताल पर जैसे सारी  प्रकृति  ही आनंदित होकर झूमने लग जाती थी  ,शिव और शक्ति का ऐसा अनुपम मिलन देख देवता भी पुष्प वर्षा करते न थकते थे 
"कैसी हो प्रिये ?' बरसों पहले की घटना कुमार की यादों में तैरने लगी। । 'तुम्हारे बिना कैसी रहूंगी '  , तुम मुझे छोड़कर क्यों चले जाते हो ,न जाया करो कुमार। . 'फिर से आने के लिए ' प्यार से मुस्कुराये कुमार 'जाऊंगा नहीं तो आऊंगा कैसे ' कहते हुए कुमार ने श्वेत -धवल महकते मोंगरे नंदिनी के केशों में सजा दिए ,निन्दिनी का रूप और निखर आया ,कुमार अपलक देखते रह गए ,प्रणय-चिह्न कपोलों पर अंकित करते हुए कहा 'नंदू '… सदा के लिए मेरी बन जाओ ,मैं जल्द ही विवाह का प्रस्ताव लेकर आता हूँ तुम्हरे माता-पिता के पास '
अचानक छिटक गयी वो उस प्रणय-आलिंगन से ,काँप  सी  गयी  वो … कुमार को समझ न आया कि अचानक ये भाव-भंगिमा क्यों बदल गयी नंदिनी की तभी किसी ने पुकारा उस पुरानी हवेली से 'नंदू उउउउ ओ नंदू उउउउउ घबरा कर नंदिनी ने कुमार का हाथ  छोड़ा  और हवेली की ओर भागती चली गयी  … उसके पैरों मैं बंधे घुंघरुओं की खनक देर तक बजती रही ,उसके महावर से सजे पैरों और वो पीली रेशमी साड़ी  …। बस यही आखिरी स्मृति रह गयी सदा के लिए कुमार के मन में। 
तब से लेकर आज तक मानो  एक युग बीत गया ,नंदिनी की वो आखिरी झलक का आखिरी  चरण ,उसे हर पल  याद में तड़पाता है ,स्वप्न में आता है ,उसी दृश्य को ,उसी स्वप्न को साकार करने कुमार यहाँ हर रोज आतें हैं कि फिर से वो गुनगुनाएंगे और नंदू का वही सुन्दर सा सजा हुआ पैर हवेली की चौखट से बाहर आयेगा ,और सदा के लिए अपना लेगा उसे , कहाँ -कहाँ नहीं ढूँढा उस पगले प्रेमी ने अपनी प्रियतमा को।  पर उसे न मिलना था  . न वो मिली ................ 
सालों  बीत गए  इस दौरान कुमार ने एक  तैल -चित्र बनाया था।  इसी छवि का  पीली साड़ी  में लिपटा  ,महावर रचा ,घुँघरू से बंधा एक चरण ,जो चौखट को लांघकर पुरानी हवेली में प्रवेश कर रहा था ' । मौलिक चित्र और उस के पीछे लिखा एक सन्देश 'चली आओ मधुरे ,जीवित तो हूँ पर प्राण नहीं ,तुम जो आ जाओगी पास मेरे ,तो भर जाएगी झोली मेरी भी खुशियों से ' 
वो चित्र जब एक नगर -वधू ने देखा तो अवाक् रह गयी उस चित्र को खरीद समय गवाए बिना जा पहुँची उसी पुरानी ,झरने के पास वाली हवेली में ,सायं-काल को  हमेशा की भांति जब कुमार ने आकर नंदिनी को अपने गीतों में पुकारना शुरू किया तो सामने उन्हें नंदिनी के होने का एहसास हुआ , बेकरारी में करार आ गया  , वो नंदू ही थी।  कुमार की प्रसन्नता का पारावार न रहा ,दो प्रेमियों का मधुर -मिलन ,सारी  सृष्टि भी जैसे झूमना चाहती थी ,'कहाँ चली गयी थी तुम मधुरे !?'अश्रु -पूरित नेत्रों से बोले कुमार  'कुमार ,मेरे स्वामी मैं आपके लायक नहीं ,उस वक़्त मैं डर गयी थी ,कह न सकी ,मैं नगर-वधू हूँ ,किसी की गृह-लक्ष्मी नहीं बन सकती।  
कुमार ने कसकर उसे गले लगा लिया 'पगली क्यों तुमने मेरा जीवन सूना कर दिया ,मुझे कोई आपत्ति नहीं ,तुम जो भी हो ,जैसी भी हो ,मेरी हो प्रिये ! 
और नंदिनी  ………………… 
उसे तो सारा जहाँ मिल गया था।  
डॉ स्वीट एन्जिल 

3 comments:

P.jAIN said...

स्वीट ....तुम साहित्य की हर विधा में पारंगत हो ....कोई भी विषय तुमसे अछूता नहीं है

प्रेम और प्रेम की भावनाओ का कितना सुन्दर चित्रण किया है तुममे

अपनी लेखनी से सम्मोहित करने की अद्भुत क्षमता है तुममे

और खुद भी तुम्हारा व्यक्तित्व कितना सम्मोहक है

विरोधाभासो का दुर्लभ सामंजस्य

अल्हड और बिंदास बाला भी

और सौम्य और गंभीर भी

तुम्हारी सृजन यात्रा यूँ ही अनवरत चलती रहे

दिल से यही कामना है मेरी
Saturday 11:40pm

Mohan Rav said...

डॉ शालिनी अगम जी माँ सरस्वती की वरद् पुत्री होने के नाते आप सृजन एवं रचनाधर्मिता की त्रिवेणी का वह अपूर्व संगम है, जिसके चिंतन और सृजन में मौलिकता का समावेश तो होता ही है। साथ ही आपकी रचनाएं अपना प्रभाव भी अविस्मरणीय तरीके से पाठक मन पर छोड़ती हैं।

Dr.Shyam Mathur said...

bahut sunder ,