Wednesday, September 8, 2010

dr.shaliniagam (tip of the day)

Namaste India
१-चलो हम सब थोड़ी देर के लिए बिलकुल मासूम बन जाएँ , एक बच्चे कि तरह ,
२-जीवन कि उठा-पटक, competition, भाग-दौड़ सब-कुछ भूलकर,केवल अपने में खो जाएँ,
३- हमारा साथ देने के लिए केवल हमारा विश्वास, हमारी innocence ,और हमारी purity है,
४-हमारे चारों ओर केवल प्यार ही प्यार महसूस करें ,अपने दिल कि सुने ,जो करना चाहते है कर डाले ,
५-पूरी कायनात आज हमारे साथ है ,हम सृष्टि के संरक्षण में है ,हमारे साथ कुछ गलत हो ही नहीं सकता,
६-एकदम भोले बन जाओ, मासूम और भोले व्यक्ति का विश्वास अपार है, उसे कोई cheat नहीं कर सकता,
७-कभी-कभी लोग हमारी सादगी प़र हसेंगे,यंहा तक कि हम स्वयम को भी मूर्ख लग सकतें हैं ,प़र हमारी innocence
ही हमारी पहचान बनेगी.
८-हमारा निर्दोष -बच्चा मनऔर हमारा खुद प़र विश्वास ही हमारे guide बनेंगे .
डॉ.शालिनीअगम
०४/१६/१०

Sunday, September 5, 2010

शालिनीअगम (कुछ शब्द मेरे आपने) काम-ऊर्र्जा उपचार



शालिनीअगम (कुछ शब्द मेरे आपने) काम-ऊर्र्जा उपचार
नमस्ते भारतवर्ष,
काम -ऊर्जा से उपचार
काम-ऊर्जा को यदि हम क्षणिक काम-सुख पाने के लिए न करके ,रोग मुक्ति के लिए करें तो ? आश्चर्य -चकित न हों ध्यान से पढ़ें ..........
हमारा मन बहुत तीव्र गति से कार्य करता है ,अपनी बौद्धिक -शक्ति से हम मन को इच्छानुसार गति देने में सक्षम हैं

काम-सुख में निमग्न होते समय हम रोग-ग्रस्त भाग प़र ध्यान केन्द्रित करें.काम-ऊर्जा और रोग-ग्रस्त स्थल के बीच संपर्क स्थापित करें।
काम-सुख के चरम बिंदु प़र पहुँचने के क्षण ही हम काम-उर्जा को रोग-स्थल प़र पहुंचा दें । न-न कोई मुश्किल कार्य नहीं है बस थोडा सा मन को साधना है। जिस क्षण काम-ऊर्जा अपनी चरम-स्तिथि में आये तब उसी क्षण अपना ध्यान रोग-स्थल प़र केन्द्रित कर दें.एक पंथ दो काज । दोनों ही कार्य सफलता-पूर्वक हो जायेंगे.कोई तनाव नहीं लायें ना पहले ना बाद में केवल यह ठीक उसी पल संभव है जब चरम-बिंदु प़र पहुँचाने के लिए काम-ऊर्जा संचित होती है.

शिव और शक्ति के मिलन को रोग - निवारण का स्रोत भी बनाया जा सकता है।
Posted by shaliniagamaggarwal at 10:56 PM 9 comments Links to this post
Labels: ०५/१८/१०
Monday, May 10, 2010
tip of the day
Thinking positiv & living happily can revive your cells.
Posted by shaliniagamaggarwal at 8:36 PM 0 comments Links to this post
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Wednesday, September 1, 2010

SHALINIAGAM (SHUBH AAROGYAM) बालक के जन्मदिवस पर


बालक  के जन्मदिवस पर
बालक है मेरे प्रेमपुष्प,
सींचती हूँ
मैं ममत्व जल से
बालक है मेरे सूर्य पुंज
किरणों को उनकी चमकाती हूँ
अपनी उर्जा से
बालक है मेरे रजत चन्द्र
दमकातीं हूँ अपनी चांदनी से,
आदित्य - शुभम है मेरे गर्व गौरव्
शक्तिमान,दैदीप्यमान है मेरी कामना से
बालक है मेरे मांगलिक दीप,
प्रज्ज्वलित है मेरे आशीर्वादों से,
हर माँ के समान ,मैने भी देखा है स्वप्न,
कुसुमित पल्लवित हो मेहकें जीवन क्यारी में,
संस्कारो की कड़ी धूप में निखरे कंचन से,
बडो का आदर,छोटो से प्यार करें दिल से,
नैतिकता व् राष्ट्रहित में लगे रहें मन से,
माँ पा के अनुशासन में, संरक्षण में,
आगे बढे जग से''........................
......................शालिनिअगम.

Saturday, August 21, 2010

shaliniagam (shubh aarogyam) rakhi par vishesh

बहना ने भाई की कलाई प़र प्यार बाँधा है,
प्यार के दो तार से संसार बाँधा है,
मेरे प्यारे राजा भैया ,
जुग-जुग जियो ,
फलो-फूलो ............
बहिन सजा कर थाल पूजा का
राखी लेकर आई ,
तिलक लगाकर राखी बांधी,
भैया की खिल उठी कलाई.........

...................तुम्हारी बहना शालू
डॉ.शालिनिअगम
मेरे राजा भैया जल्दी से अच्छे हो जाओ

Wednesday, August 18, 2010

dr.shaliniagam (shubh aarogyam)प्रसन्नता ही हमारी संजीवनी है .........

प्रसन्नता ही हमारी संजीवनी है .........

मेरी एक अन्तरंग सहेली जो अत्यंत दुखी ,निराश, अनिंद्रा और अपच का शिकार थी उसने निश्चय किया की वह अब मेरी तरह ही हँसेगी,हर हाल में खुश रहेगी . दिन में हर -पल बस वही बातें सोचेगी जिससे हसीं आये.
भले ही उसके पास हँसने का कोई उपयुक्त कारण हो न हो .
अपने आस-पास का माहौल खुशनुमा बनाये रखेगी. उसने मुझसे पूछा ,"डॉ.शालिनी अगर मैं मन से दुखी हूँ ,तो कोशिश करने प़र भी मुझे हंसी नहीं आती ,मैं क्या करूँ .." तब मैंने उसे निम्न बातें समझायीं ...........और परिणाम -स्वरुप वह धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगी ,उसके परिवारजन उसमे आये बदलाव के कारण आश्चर्य में पड़ गए. पहले-पहल तो उन्हें कुछ समझ नहीं आया पर धीरे -धीरे घर का माहौल बदलने लगा और सभी दिल खोलकर हँसने लगे .............. हर - पल दुखी दिखने वाला परिवार आज सबसे ज्यादा खुश दिखाई देता है .
अब आप पूछोगे की मैंने उसको क्या बताया........??????
१- हँसें .....रोग से मुक्ति मिलती है और रुग्ण व्यक्ति के शरीर में नई शक्ति का संचार होता है .
२- प्रसंन्न-चित्त व्यक्ति हमेशा तरोताजा रहता है.,हँसने से आयु बढती है. ,उत्साह में वृद्धि होती है ,कार्य-शक्ति बढती है .
३-प्रसन्नचित्त व्यक्ति को सभी लोग पसंद करतें है,क्योंकि उनके दिल में कपट,द्वेष, ईर्ष्या , और बैर-भाव समाप्त हो जाता है .क्योंकि जिसने अपने ह्रदय में बैर-भाव को स्थान दिया होता है, वह व्यक्ति ,खुलकर नहीं हँस सकता
४- मानसिक स्वास्थ्य के लिए किसी तार्किक प्रक्रिया की अपेक्षा खूब जोर से हँसना अधिक हितकारी होगा.
५-अत्यधिक शारीरिक श्रम,ठण्ड में रहना और पानी में भीगना,आलसी स्वाभाव और नशा यह सब मनुष्य के घोर शत्रु हैं किन्तु इससे भी बड़ा शत्रु है चिडचिडा स्वाभाव .वह व्यक्ति जिसे जरा -जरा सी बातों प़र क्रोध आया करता है, उसका जीवन दूभर हो जाता है वह अपने साथ अपने आस-पास वालों के लिए भी मुसीबत बन जाता है. वह न तो खुद सुख से रह पता है न किसी को रख पाता है.
६-रोते कुढ़ते व्यक्ति को कोई भी पसंद नहीं करता,हर नज़र को मुस्कराहट अच्छी लगती है.
७- हमेशा याद रखे की उन्मुक्त हँसीं हमारे और हमारे परिवार-जनों के लिए बेहद लाभ-कारी औषधि है.
८-प्रसन्नता संजीवनी है,हँसना परमात्मा प्रदत्त औषधि है,हँसने से दिल की धड़कन बढती है, फेफड़ों में स्वच्छ वायु जाती है,खूब जोर-जोर से हँसने से चेहरे और मस्तिष्क में रक्त-प्रवाह तेजी से होता है तथा चेहरे प़र लालिमा व् निखार आता है,बुद्धि तीव्र होती है .
९-उस दिन को बेकार समझो जिस दिन तुम खुलकर हँसें नहीं...........
शरीर-विज्ञानं का निष्कर्ष है की सभी संवेदन-शील नाड़ीयां आपस में जुडी रहतीं हैं और जब उनमें से कोई एक नाड़ी समूह मस्तिष्क की ओर कोई बुरा समाचार ले जाता है तो उससे आम नाड़ीयाँ भी प्रभावित होतीं है,विशेष कर उदर की ओर जाने वाला नाड़ी-समूह तो अत्यधिक प्रभावित होता है,परिणाम- स्वरुप इससे अपच हो जाता है. इसका प्रभाव मनुष्य के चेहरे प़र भी पड़ता है जिससे चेहरा निस्तेज हो जाता है,उत्साह मंद पद जाता है,और कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती.
१०-परफेक्ट लाइफ किसी की नहीं होती ,हर किसी के पास दुखी रहने की वज़ह हैं ....प़र उनसे निकलना ही बहादुरी है........
धन कमाने की हवास,दूसरों से होड़ करने की सोच , "हमेशा अपना काम और दूसरों का ज्यादा "देखने की प्रवत्ति ,दूसरों की उन्नति से जलना -कुढ़ना ,व्यर्थ की चिंताएं ,काल्पनिक दुर्घटनाओं से भयभीत रहना ,हमेशा अपने अंदर ही कमी निकलते रहना .........ये ऐसे विचार हैं जिससे मनुष्य हँसना -मुस्कुराना ही भूल गया है.
११- प्यारे मित्रों ! हँसीं जीवन का मुख्य अवयव है. जिसके जीवन में हँसीं नहीं ,वह मृत्यु-तुल्य है . हँसना जीवन का एक ऐसा संगीत है जिसके बिना जीवन एकदम नीरस है ,हँसना एक आनंद-दायी एहसास है .