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Monday, April 19, 2010

निरंतर .........

तिल-तिल कर कसकती ,
इस जिंदगी का
खात्मा कर दूं अभी,
इन खोखले आदर्शों
की माला को ,
तोड़ दूं अभी,
इन गलती-सडती साँसों का
आवागमन रोक दूं अभी ,
इस भरी-पूरी दुनियां में
क्यों हूँ मैं अकेली ?
मेरे अपने मुझे स्वीकारते क्यों नहीं?
तो क्यों?...............................
इन संस्कारों की दुहाई देकर,
इस आशाहीन ध्येय रहित
जीवन को, जिए जा रहीं हूँ मैं ................................
निरंतर .............
2010