Monday, April 19, 2010

TIP OF THE DAY

ये ज़िन्दगी बेहद खूबसूरत है,
अगर हम चाहें तो और भी ख़ूबसूरत हो सकती है ,
क्योंकि हमारी ख्वाहिश ये सृष्टि मानती है और उसे उसे पूरा करती है.
ये अलौकिक शक्तियां मेरे लियें अलादीन का चिराग़ हैं जो मांगती हूँ मिलता है.......
.......पैसा, प्यार, शौहरत , स्वास्थ्य .
हर पल जो चाहतो हो मांगो सृष्टि से ,
विश्वास करो कि जो माँगा है ,बस पा ही लिया है,
महसूस करो कि जो माँगा, उसे पाने के बाद कितनी ख़ुशी मिल रही है,
में जो चाहती हूँ ,उस पर विचार करती हूँ, कागज पर लिखती हूँ,
फिर अटूट विश्वास करती हूँ,आशावादी सोच रखती हूँ ,
फिर मैं उसे पा लेती हूँ .
हम सबको अपने और सृष्टि के बीच ताल-मेल बिठाना आना चाहिए
जब भी हालत बदलने हों ,पहले विचार बदलो .
क्योंकि मैं प्रकृति का , सृष्टि का, धन्यवाद करती हूँ , ज्यादा पाना चाहती हूँ तो शुक्रिया करती हूँ
इच्छा -शक्ति से क्या नहीं हो सकता ,आप अपनी इच्छा-शक्ति और यकीन से आप क्या नहीं पा सकते.
अपनी उम्मीद से बड़ी कोई तस्वीर , कोई इच्छा देखो,सोचो, आँखे बंद करके महसूस करें कि वह मजिल मैंने पा ली है .
डॉ.शालिनीअगम
2010

Sunday, April 18, 2010

सौंदर्य का सार

सौंदर्य का सार
सौंदर्य ........................................
भला लगता है नेत्रों को,
सुखद लगता है स्पर्श से,
सम्पूर्ण विश्व एक अथाह सागर ,
जिसमें भरा है सौंदर्य अपार ,

हर चर-अचर हर प्राणी ,
सौंदर्य को पूजता है बारम्बार !
सौंदर्य का कोष है पृथ्वी-लोक ,
सौंदर्य का भण्डार है देव- लोक,
प्रत्येक पूजित-अपूजित व्यक्ति,
कल्पना करता है तो केवल ,
सौंदर्य को पाने की ,
परन्तु......................
ऐसे कितने मिलते हैं यंहा ,
जो रूपता-कुरूपता को,
समान पलड़े प़र तोलते हैं ,
जो चाहतें हैं मानव-मात्र को
मानते हैं दोनों को समान?शायद कुछ एक- ही ,
कहीं ये एक समझौता तो नहीं ,
अपने को सर्वश्रेष्ठ दिखाने का,
औरों से भिन्न कहलाने का,
कोई प्रयत्न तो नहीं ?
नहीं!.......................
ये कठोर सत्य है.
वे वस्तुत: प्रेमी हैं ,
मन कि सुन्दरता के,
शारीरिक सौंदर्य जिन्हें ,
भटकता नहीं है,
वास्तविक जिंदगी से दूर,
उन्हें ले जाता नहीं है;

डॉ.शालिनीअगम
1989

कुछ शब्द मेरे अपने]

पिता के लिए
गुप्तजी ने लिखा था कि..........
राम तुम इश्वर नहीं मानव हो क्या,
प़र मैं कहती हूँ पिताश्री,
राम! तुम मानव नहीं इश्वर हो क्या?
सदैव सहज मुस्कान,निस्पृहता,
मौन ,उदात्त ,निस्संगता से,
अपने भीतर लबालब स्नेह से भरे,
इस धरती प़र, संबंधों प़र,
स्नेह- निर्झर से बहते ,
मैं जानती हूँ ............
आपका मौन अभिमान नहीं,
मनन होता है ,
निरावेगी रूप के पीछे ,
प्रेम का आवेग होता है,
सहज , सरल , व्यक्तित्व ,
बेहद निर्मल , विनयशील है,
पिता! आप ही नम्र आत्मीय ,
मर्मज्ञ प्रबुद्ध हैं ,
दिखावटी संभ्रांत नहीं ,
एकान्तिक भोले-भंडारी हैं ,
जो अपनी उपस्तिथि से ,
अपना परिवेश अनजाने में ही,
सुवासित करते रहतें हैं,
..................................
अगर दो में से एक भी संतान को,
आपके कुछ गुण उधार लेकर (हकपूर्वक)
उनमें डाल सकूं ,
अगर जीवन-समर में ,
कहीं भीं कभी भी
स्वम जीत कर आपका ,
मान रख सकूं ,
तो हे राम ! राम -सुता होने ,
का दायित्व निभा सकूं,
................................
पिता के जन्म-दिन प़र,
५ सितम्बर १९९५
डॉ.शालिनीअगम

Saturday, April 17, 2010

भरोसा

हाथों का स्पर्श हटा लेने से ,
मन का विश्वास कम नहीं हो जाता,
अपनों से दृष्टि घुमा लेने से,
रिश्तों का भान कम नहीं हो जाता,
रवि के बादलों में छिप जाने से ,
दिन का उजाला , कम नहीं हो जाता,
पूर्णमासी का चाँद निकलने प़र भी,
रात्रि का अन्धकार समाप्त नहीं हो जाता,
बांध को बांधने प़र भी ,
मचलती धारा का वेग कम नहीं हो जाता;
अपनों के लाख तिरस्कार के बाद भी ,
उनकी घोर घृणा के बाद भी,
उन प़र भरोसा कम नहीं हो जाता!
शालिनिअगम
१९९

Tip of the day

रिश्तों को खराब करने वाले कारण

* तनाव
* आपसी बातचीत का आभाव
* खीज
* तुच्छ विचारों का होना
* आपसी मेल-भाव का ना होना
* प्रशंसा का आभाव
* आत्मप्रशंसा का आभाव
* आपसी संदेह / शक
* आलस
* अपने-आप में ही रम जाना
* धैर्य हीनता
* आत्महीनता का बोध
* ख़राब स्वास्थ्य
* अविश्वास
* क्रोध
* आपसी सम्मान का आभाव
* नैतिकता का पतन
* एक दूसरे की सहायता ना करना
* आपसी मतभेद
* उबाऊ वातावरण
* अप्रसन्नता

डॉ.शालिनीअगम
2010

Friday, April 16, 2010

Tip of the day

सफलता को दूर रखने वाली कुछ रुकावटें

1. घमंड
2. हार का डर/ सफलता प़र यकीन ना होना
3. आत्मध्येय का आभाव
4. दृढ़ निश्चयी न होना
5. पारिवारिक जिम्मेदारियां
6. धन-सम्बन्धी समस्याएं
7. एकाग्रता का आभाव
8. अपनी बात पर अडिग न रहना
9. व्यापार अथवा व्यवहार में भरोसा ना दिखाना
10. आत्मप्रशंसा ना करना.

डॉ.शालिनीअगम
2010

Tuesday, April 13, 2010

kuch shabd mere apne

उसकी छवि के आकर्षण में ,
मै मुग्ध हुई सुधि भूल गयी,
ह्रदय से प्रणय- गान आये होठों तक,
मन में हिलोरे जगाकर रह गए,
आवेश में लिया प्रियतम ने जब अपने;
मन पिघला प्रेम-रस बहने लगा ,
खिंच कर मधु भरे आलिंगन में,
तन झूमा, स्व दहकने लगा ;
डॉ.शालिनीअगम
1990