पिता के लिए
गुप्तजी ने लिखा था कि..........
राम तुम इश्वर नहीं मानव हो क्या,
प़र मैं कहती हूँ पिताश्री,
राम! तुम मानव नहीं इश्वर हो क्या?
सदैव सहज मुस्कान,निस्पृहता,
मौन ,उदात्त ,निस्संगता से,
अपने भीतर लबालब स्नेह से भरे,
इस धरती प़र, संबंधों प़र,
स्नेह- निर्झर से बहते ,
मैं जानती हूँ ............
आपका मौन अभिमान नहीं,
मनन होता है ,
निरावेगी रूप के पीछे ,
प्रेम का आवेग होता है,
सहज , सरल , व्यक्तित्व ,
बेहद निर्मल , विनयशील है,
पिता! आप ही नम्र आत्मीय ,
मर्मज्ञ प्रबुद्ध हैं ,
दिखावटी संभ्रांत नहीं ,
एकान्तिक भोले-भंडारी हैं ,
जो अपनी उपस्तिथि से ,
अपना परिवेश अनजाने में ही,
सुवासित करते रहतें हैं,
..................................
अगर दो में से एक भी संतान को,
आपके कुछ गुण उधार लेकर (हकपूर्वक)
उनमें डाल सकूं ,
अगर जीवन-समर में ,
कहीं भीं कभी भी
स्वम जीत कर आपका ,
मान रख सकूं ,
तो हे राम ! राम -सुता होने ,
का दायित्व निभा सकूं,
................................
पिता के जन्म-दिन प़र,
५ सितम्बर १९९५
डॉ.शालिनीअगम
Sunday, April 18, 2010
Saturday, April 17, 2010
भरोसा
हाथों का स्पर्श हटा लेने से ,
मन का विश्वास कम नहीं हो जाता,
अपनों से दृष्टि घुमा लेने से,
रिश्तों का भान कम नहीं हो जाता,
रवि के बादलों में छिप जाने से ,
दिन का उजाला , कम नहीं हो जाता,
पूर्णमासी का चाँद निकलने प़र भी,
रात्रि का अन्धकार समाप्त नहीं हो जाता,
बांध को बांधने प़र भी ,
मचलती धारा का वेग कम नहीं हो जाता;
अपनों के लाख तिरस्कार के बाद भी ,
उनकी घोर घृणा के बाद भी,
उन प़र भरोसा कम नहीं हो जाता!
शालिनिअगम
१९९
मन का विश्वास कम नहीं हो जाता,
अपनों से दृष्टि घुमा लेने से,
रिश्तों का भान कम नहीं हो जाता,
रवि के बादलों में छिप जाने से ,
दिन का उजाला , कम नहीं हो जाता,
पूर्णमासी का चाँद निकलने प़र भी,
रात्रि का अन्धकार समाप्त नहीं हो जाता,
बांध को बांधने प़र भी ,
मचलती धारा का वेग कम नहीं हो जाता;
अपनों के लाख तिरस्कार के बाद भी ,
उनकी घोर घृणा के बाद भी,
उन प़र भरोसा कम नहीं हो जाता!
शालिनिअगम
१९९
Tip of the day
रिश्तों को खराब करने वाले कारण
* तनाव
* आपसी बातचीत का आभाव
* खीज
* तुच्छ विचारों का होना
* आपसी मेल-भाव का ना होना
* प्रशंसा का आभाव
* आत्मप्रशंसा का आभाव
* आपसी संदेह / शक
* आलस
* अपने-आप में ही रम जाना
* धैर्य हीनता
* आत्महीनता का बोध
* ख़राब स्वास्थ्य
* अविश्वास
* क्रोध
* आपसी सम्मान का आभाव
* नैतिकता का पतन
* एक दूसरे की सहायता ना करना
* आपसी मतभेद
* उबाऊ वातावरण
* अप्रसन्नता
डॉ.शालिनीअगम
2010
* तनाव
* आपसी बातचीत का आभाव
* खीज
* तुच्छ विचारों का होना
* आपसी मेल-भाव का ना होना
* प्रशंसा का आभाव
* आत्मप्रशंसा का आभाव
* आपसी संदेह / शक
* आलस
* अपने-आप में ही रम जाना
* धैर्य हीनता
* आत्महीनता का बोध
* ख़राब स्वास्थ्य
* अविश्वास
* क्रोध
* आपसी सम्मान का आभाव
* नैतिकता का पतन
* एक दूसरे की सहायता ना करना
* आपसी मतभेद
* उबाऊ वातावरण
* अप्रसन्नता
डॉ.शालिनीअगम
2010
Friday, April 16, 2010
Tip of the day
सफलता को दूर रखने वाली कुछ रुकावटें
1. घमंड
2. हार का डर/ सफलता प़र यकीन ना होना
3. आत्मध्येय का आभाव
4. दृढ़ निश्चयी न होना
5. पारिवारिक जिम्मेदारियां
6. धन-सम्बन्धी समस्याएं
7. एकाग्रता का आभाव
8. अपनी बात पर अडिग न रहना
9. व्यापार अथवा व्यवहार में भरोसा ना दिखाना
10. आत्मप्रशंसा ना करना.
डॉ.शालिनीअगम
2010
1. घमंड
2. हार का डर/ सफलता प़र यकीन ना होना
3. आत्मध्येय का आभाव
4. दृढ़ निश्चयी न होना
5. पारिवारिक जिम्मेदारियां
6. धन-सम्बन्धी समस्याएं
7. एकाग्रता का आभाव
8. अपनी बात पर अडिग न रहना
9. व्यापार अथवा व्यवहार में भरोसा ना दिखाना
10. आत्मप्रशंसा ना करना.
डॉ.शालिनीअगम
2010
Tuesday, April 13, 2010
kuch shabd mere apne
उसकी छवि के आकर्षण में ,
मै मुग्ध हुई सुधि भूल गयी,
ह्रदय से प्रणय- गान आये होठों तक,
मन में हिलोरे जगाकर रह गए,
आवेश में लिया प्रियतम ने जब अपने;
मन पिघला प्रेम-रस बहने लगा ,
खिंच कर मधु भरे आलिंगन में,
तन झूमा, स्व दहकने लगा ;
डॉ.शालिनीअगम
1990
मै मुग्ध हुई सुधि भूल गयी,
ह्रदय से प्रणय- गान आये होठों तक,
मन में हिलोरे जगाकर रह गए,
आवेश में लिया प्रियतम ने जब अपने;
मन पिघला प्रेम-रस बहने लगा ,
खिंच कर मधु भरे आलिंगन में,
तन झूमा, स्व दहकने लगा ;
डॉ.शालिनीअगम
1990
Monday, April 12, 2010
kuchshabdmereapne
मैं तड़प रही मीन संमान,
जल से बाहर फेंक दी गयी,
सब कहें अंह,सूरज-चाँद -सितारे,
फूल- फल सब तेरे पास,
फिर कहे तू हो गयी उदास,
जीवन के अनगिनत रूप यंहा,
जल के भीतर ये सम्पदा कंहा,
भौतिक जगत के आनंद सभी ,
पर .........
तू घुटकर मरने को तैयार अभी,
न रस, न सुगंध,न रूप,से सरोकार,
मुझे तो बस जाना है जल के उस पार,
मैं जल क़ी रानी , जल मेरा प्रियतम,
जल मैं ही रानी मेरा निवास,
वो है अब समीप मेरे,
बाकी न बची अब कोई आस:
शालिनिअगम
1989
जल से बाहर फेंक दी गयी,
सब कहें अंह,सूरज-चाँद -सितारे,
फूल- फल सब तेरे पास,
फिर कहे तू हो गयी उदास,
जीवन के अनगिनत रूप यंहा,
जल के भीतर ये सम्पदा कंहा,
भौतिक जगत के आनंद सभी ,
पर .........
तू घुटकर मरने को तैयार अभी,
न रस, न सुगंध,न रूप,से सरोकार,
मुझे तो बस जाना है जल के उस पार,
मैं जल क़ी रानी , जल मेरा प्रियतम,
जल मैं ही रानी मेरा निवास,
वो है अब समीप मेरे,
बाकी न बची अब कोई आस:
शालिनिअगम
1989
freedom
उड़ जाऊँ नील गगन में
पंख फैला कर अपने,
बतीयाऊँ बादलों से ,
खेलूँ खुले गगन में,
छेड़ू पंछियौ को,
फिर. चुपके से..
उतरू सजना के अंगना,
बनूँ मन मोहनी,
बोलूं मीठी बोली,
जब हाथ बढें प्रीतम का,
फिर फुर्र से उड़ जाऊँ मैं.
shaliniagam
पंख फैला कर अपने,
बतीयाऊँ बादलों से ,
खेलूँ खुले गगन में,
छेड़ू पंछियौ को,
फिर. चुपके से..
उतरू सजना के अंगना,
बनूँ मन मोहनी,
बोलूं मीठी बोली,
जब हाथ बढें प्रीतम का,
फिर फुर्र से उड़ जाऊँ मैं.
shaliniagam
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